की जब मैं आईना देखती हूँ।

जब निकली थी इस सफर पर, मैं खुद को ढूंढने आयी थी, मगर अब एक रेशमी मकान के लिए कहीं घर छोड़ आई हूँ,

कि अब इतने लिबास हैं मुझपे की इन लिबासों में कहीं खुद को खोजती हूँ,

की जब मैं आईना देखती हूँ, इस तस्वीर में अपनी पहचान ढूंढती हूँ।

जज़्बात थे कई जो अब कहीं खो गए है, वक़्त की इस लड़ाई ने एक बहरूपिया बना दिया है कि अब तो भूल गयी हूँ की सच में कैसी दिखती हूँ,

की जब मैं आईना देखती हूं, इन खाली आखों में कोई बात ढूंढती हूँ।

ज़माने के साथ चलने के लिए कहीं खुद को छोड़ आई हूँ, कि अब हंसती हूँ तो लगता है झूठ बोल रही हूँ,

की जब मैं आईना देखती हूं, अपनी हँसी में एक मुसकान ढूंढती हूँ।

रिश्ते तो बहुत पहले हुआ करते थे अब सिर्फ लोग हैं, कि जैसे ज़िंदा तो हूँ लेकिन ज़िन्दगी नासाज़ है, मुसलसल इन सड़कों में अब अपने जज़बात ढूंढती हूँ,

की जब मैं आईना देखती हूं, ज़िन्दगी की इस रंजिश में कल सुबह उठने की कोई वजह ढूंढती हूँ।

कि सच कहूँ तो यह आईना तोड़ देने का दिल करता है,

लेकिन क्या करे,

शहरों में तो यूँही चलता है।

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5 thoughts on “की जब मैं आईना देखती हूँ।

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  1. Your words are as beautiful written in Urdu as in English, if not more. I can’t help but identify this piece with you-intricately simple and heartwarming. Lots of love!

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